ईश्वर की पहचान

यूँ चला हत्याओं का दौर कुछ—
ज़िन्दगी घबराने लगी;
धर्म, जाति, कुल, वंश—
सबमें मृत्यु नज़र आने लगी।
मनुष्य, मनुष्यता का
कत्ल कर के
वीर कहलाने लगा;
इंसान को इंसान में
दैत्य नज़र आने लगा।

मेरी आत्मा रोई—
आँसू टपका न सकी;
सभी अपने ही से लगे—
कौन भिन्न था,
बता न सकी।

पर शायद यह
मेरी नज़र का भ्रम था,
या मनुष्य को
मैंने जाना कम था।
वर्ना कौन कहता है—
मनुष्य, मनुष्य से भिन्न नहीं है?
जाति, वर्ण, धर्म—
सब ही तो जुदा हैं।

होते होंगे भगवान भी—
शायद;
पर मेरा तो
खुदा है।

रह गया ईश्वर
बस एक रिवाज़ बन कर—
बुत और मंदिरों की
चारदीवारी में बंद;
रह–रह कर
जिसकी पहचान पर
मेरी ही समझ
प्रश्नचिह्न लगाने लगी।

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