मोती
(Revised & Polished Version – Navneet Kumar, August 1987)
1.
बिखरे शब्दों के मोती—
पास यदि तुम मेरे होती,
माला पिरोती।
मैं चुन–चुन कर देता मोती
मेरे शब्दों के उर में,
जलती प्रेम की ज्योति।
2.
मोती संजोए जाते,
माला में पिरोए जाते;
तुम्हारे गात पर सजते,
बनकर माला प्रीत के मीत,
या गीत मधुर बन जाते।
तुम्हारे लबों से उभरते
गीत मेरे—
प्रीत के मोती,
मीत मेरे,
गीत तुम्हारे बन जाते।
3.
मैं होंठों से चुनता—
चूम तुम्हारे ओंठ, प्रिय—
शब्दों के मोती
अपनी कविता में सजाता।
और कुछ और मीठा करने को उनको,
गाल के चुम्बन
धीरे से चुराता।
4.
पास यदि तुम मेरे होती—
लाज–मिश्रित, प्रेम–जड़ित
मुस्कान में लिपटे क्षण।
प्रेम के कोमल शब्द,
प्रभात की बेला में,
गुलाब की पंखुड़ियों पर रुकी
ओस के कण।
जीत ही लेते मन;
उठते उर में कविता बन,
लबों पर आते—
और तुम्हारे चुम्बन का
मीठा स्वाद पुन:
मेरे होंठों पर
छोड़ जाते।
5.
फैलाती पंख—
कल्पना फिर से,
जो अब तक मन में थी सोती।
बिखरे शब्दों के मोती…
पास यदि तुम मेरे होती।
6.
पास यदि तुम मेरे होती।
मैं लब तक लाता शब्द,
कुछ कहना चाहता;
तुम नज़रें उठाती,
पढ़ती मेरे मुख पर लिखी
अंतरमन की बात।
शर्माती, नज़रें झुकाती;
गालों पर हल्की
लाल गुलाबी लाज
उभर आती।
7.
बैठे रहते हम चुप;
बिन कहे ही
सुनते दिल से दिल की बात।
बात से खिलते,
मिलते ओंठ—
मिलन से पुलकित होता गात।
शब्द झिलमिल झिलमिलाते,
पंक्तियों में सज जाते;
और तुम्हारे गले में पड़ी
माला में से नज़र आते।
8.
तुम संगीत की उंगलियों से
उठाती माला का मोती—
फूल की पंखुड़ियों से,
ओंठों में दबाती।
जोबन से उठते
शब्दों के मोती
माला में सजे
लबों में रुक जाते।
तुम लज्जाती—
कुछ कह न पाती,
ओंठों में दबे मोती गिराती;
अधरों पर आई बात
पुनः हृदय में
दब कर रह जाती।
9.
मैं प्रतीक्षा में रहता—
डरता, बढ़ा कर अपना हाथ
तुम्हारे तन से लगी माला
छू भी नहीं पाता।
प्रीत मेरी—
तुम्हारे गले की माला;
हर चुम्बन उसका मोती बन
छू–छू छूता तन
सिहरन जगाता।
पास यदि तुम मेरे होती—
न होता उन्मन
मन का मोती।
10.
पेड़ों से नीचे
वर्षा की बूँदें टपकतीं—
पत्तों के अंगों से
लिपटती, सरकती, बहती;
अह–रह कर
मेरे अंग भिगोतीं।
देखता मैं ऊपर, मुस्कुरा कर कभी—
उनकी अठखेली से झुँझला कर।
11.
छू जाती मेरा गाल
फिर से कोई बूँद अचानक—
जैसे ले लेती तुम
चुंबन अकस्मात,
फिर मुस्कुरा कर
भाग जाती मुझे, ठेंगा दिखा कर।
मैं पेड़ के नीचे खड़ा—
गिरती बूँदों से न झुँझलाता;
तुम्हारी शरारत का बदला लेने
दौड़ तुम्हारे पीछे आता।
थाम तुम्हारा हाथ—
ले चलता तुम्हें
बूँदों की, मोतियों की
पंक्तियों के बीच।
तुम छुपती, छुपाती,
शर्माती, लज्जाती—
एक सम्पूर्ण कविता
बन जाती।
12.
रुक जाते कुछ कण
तुम्हारे बालों पर—
मैं अधरों से चुन लेता
गालों पर सरकते मोती।
पास यदि तुम मेरे होती।
13.
वर्षा की पड़ती फुहार—
खेलते हम, भीगते,
करते प्यार।
भीगे वस्त्रों से झाँकता बदन
मनीहार—
झीने बादलों से जैसे
झाँकता चाँद साकार।
लज्जाती तुम—
तन छुपाती,
खुद में सिमट जाना चाहती;
भीगी चुनरी से
ढकती कुड़कुमल स्तन—
पहाड़ों पर
पुनः धुंध की चादर
छाती।
14.
प्रेम–कलश, कुच–कोरक मोती—
झीनी चुनर
लाज की गोती।
मैं अधरों से चुन लेता मोती—
पास यदि तुम
मेरे होती।
— Navneet Kumar (August 1987)